सोने दो

बंद हैं कमरे, अंधेरे हैं साथ, सोने दो,
उजाले तुम लाओ न साथ, सोने दो।

पलकें हैं झुकी, लगाओ न हाथ, सोने दो,
पास बैठो मग़र करो न बात, सोने दो।

ख़्वाबों के झगड़े फ़साद, होने दो,
करो सिर्फ सोने की बात उन्हें रोने दो।

मुझे इक दफ़ा फिर फ़ज़ाओं में खोने दो,
बंद हैं कमरे, अंधेरे हैं साथ, सोने दो।

ढल चुकी रात, ना कोई मुलाक़ात, होने दो,
आँखें हों बंद, बस मन में ही बात, होने दो।

इस रात, मुझे ऐसे ही ख़्यालात बोने दो,
बंद हैं कमरे, अंधेरे हैं साथ, सोने दो।

-vj

काश कोई बात कर ले

काश कोई बात कर ले,
दिन तो गुज़र गया,
रात कोई पार कर दे,
काश कोई बात कर ले।

भरा पड़ा संपर्कों से फ़ोन,
मित्रों चित्रों का भंडार और अतरंगी से टोन,
रात्रि हुई भोजन हुआ जब लगा हाथ से फ़ोन,
बातें अब कोई दो चार कर ले,
काश कोई बात कर ले।

कुछ संपर्कों के अलग ही शान होते हैं,
पता नहीं वो कब ऑन होते हैं।
दिखते तो ऑनलाइन हैं,
पर हम अनजान होते हैं।
यूँ व्यस्तता इतनी उनकी,
बातों में भी नहीं जान होते हैं,
कोई तो यह समस्या निज़ात कर दे,
काश कोई बात कर ले।

किसी वार्ता की ही बात करते हैं,
जब हम बातें थोड़ी ऑन करते हैं,
उसने अनजाने में किया हो मेसज,
ऐसे ही तान भरते हैं।

यह शिकायतें नहीं मिरी यह तो रोज़ की बात है,
आज यह पहली नहीं, ना जाने कौन-सी रात है,
मैं कभी देर ना हो जाऊं, किसी प्रतिउत्तर में,
मन कहता है जा फ़ोन आन कर ले,
काश कोई बात कर ले।

-vj

नीर

नीर हूँ मैं,
जैसे सागर में बहती, वैसे ही साँसों में रहती,
निःस्वार्थ इस जग में हर प्राणी की खीर हूँ मैं,
नीर हूँ मैं,

तू याद करेगा उस पल, जब सफर में होगा निर्जल,
भोज्य की तृप्ति जैसी, प्यासे की झील हूं मैं,
नीर हूँ मैं,

कण-कण की प्यास बुझाऊँ, जीने की आस जगाऊँ,
घाटों पर सान से बहती आज बोतल में सील हूँ मैं,
नीर हूँ मैं,

एक रंग और रुप में कई नामों में बदल जाती हूँ,
कहीं गंगा, कहीं गोमती, कहीं शारदा कहलाती हूँ,
और मलिन ना कर मुझको, घर-घर की कोहिनूर हूँ मैं,
नीर हूँ मैं।

-vj

अब नींद किसे होती है, और चैन किसे आता है।

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है,

तन्हाई में खोकर मन,
जब गम को गले लगाता है,

वो रो नहीं पाता है,
सपनों में खो नहीं पाता है,

कल की चिंता में,
खुश हो नहीं पाता है,

फिरसे सिमटकर तब,
पग नई दिशा बढ़ाता है,

कभी विफल हो जाता है,
कभी सफलता हाथ लगाता है,

पर राह नई बनाता है,
चलना भी सीख जाता है,

रुक-रुक कर भी वो,
मंजिल को गले लगाता है,

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है।

इक मंजिल हाथ लगी जब,
दूजे की आस से, भर जाता है,

थोड़ा-सा ही मुस्काता है,
अब लक्ष्य बड़े बनाता है,

चींटी की चाल चलकर,
सफलता की मार्ग सजाता है,

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है।

कभी राह नहीं मिलती जब,
मुसाफिर हो जाता है,

छोटे-छोटे कदमों से,
लंबी निशान बनाता है,

आस नये जागता है,
राह नये बनाता है,

दुनियां कहेगी क्या, छोड़कर,
जब मन की सुनने लग जाता है,

कुछ नया ही कर जाता है,
कुछ नया ही बन जाता है,

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है।

कोरा कागज़

यहाँ तो सभी कोरे कागज़ पर,
कुछ न कुछ लिखने के लिए बैठे हैं,
हम भी हाथों में अपनी सियाही लिए रहते हैं।

बस इसलिए,
कि कुछ लिख सकें,
हम भी शब्दों में दिख सकें….

यूँ तो एक बिंदु लगाने से पहले, कुछ एहसास संजोए रहता हूँ,
ज़ुबाँ से जो कहा न जाये, उस अल्फाज़ में खोए रहता हूँ,
उत्सुक हों जो उगने को, वही बीज बोये रहता हूँ,
निखरकर आये और भी, पहले से ही भिगोये रहता हूँ।

बहरहाल…
जो लिखने को आया हूं वो लिख कर ही जाऊंगा,
इन शब्दों को ही मैं अपनी ज़ुबान बनाऊंगा,
क्या पता आज किस पढ़ने वाले को यह लिखना भा जाए,
और रफ़्ता-रफ़्ता कल मुझे भी लिखना आ जाए।

मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं

मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं,
ना मदिरा न गुड़गुड़ न जाम पीता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

सुबह की झपकी के बाद,
जब आँखे भिगोता हूं,
नई किरणों को ओढ़कर,
हवाओं में सोता हूं,
न कल की फ़िक्र होती है,
न आज की चिंता में रोता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

घुटन की बाधा नहीं होती,
तन कभी प्यादा नहीं होती,
मैं खुद को वज़ीर मानकर,
चाल जब मन चाहा चल देता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

आज मैं खोना नहीं चाहता,
कल भी रोना नहीं चाहता,
यूँ कल-कल की चिंता में भी,
कौन ख़ुश होना नहीं चाहता,
नये आस में तरकर जब,
काज़ आनोखा कर देता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

मन की बात

मन की हैं जो ये बातें लिखेंगे तुमको हम,
पढ़ना या ना पढ़ना, लिखना ना होगा कम,
सांसों का है यह कहना, यूँ ख़फ़ा ना होंगे हम,
चाहे विरह की बातें तुम ना करो ख़तम।