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कविता

मुस्कुरा कर देखो

बैठो कभी आईने के सामने और मुस्कुरा कर देखो,
फिर भी ग़र मुस्कुराहट, आये ना हाथ तो मुख बनाकर देखो।

तुम ढूढ़ लोगे उस शख्स को जिसे ढूढ़ते हो हर रोज़,
ज़रा आईने की शख्सियत से इश्क़ फ़रमा कर देखो।

वह इन्तिज़ार में किस के है, तुम पहचान लोगे,
इश्क़ तुम्हें तुम्ही से है करना, जब मान लोगे।

उस शख्सियत को इक दफ़ा गले लगा कर देखो,
 बैठो कभी आईने के सामने और मुस्कुरा कर देखो।

-vj

चित्र श्रेय: इंटरनेट

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कविता

हम भी बच्चे थे

जो ख़्वाब थे, सच्चे थे,
जैसे थे, अच्छे थे,
जो ख़्वाब थे, सच्चे थे।

माना हम बच्चे थे,
पर मन के सच्चे थे,
शरारतें लाख कर रक्खे थे,
शैतानियों में भी पक्के थे,
मन-मुटाव न रक्खे थे,
क्योंकि हम बच्चे थे,
जो ख़्वाब थे, सच्चे थे,
जैसे थे, अच्छे थे।

हज़ार ख़्याल सजा रक्खे थे,
हज़ार ख़्वाब बना रक्खे थे,
कभी अदाकार बन रक्खे थे,
कभी कलाकार बन रक्खे थे,
कभी सूट डॉक्टर की होती,
कभी फ़ौजदार बन रक्खे थे,
हम तन-मन के भी पक्के थे,
क्योंकि हम बच्चे थे,
जो ख़्वाब थे, सच्चे थे,
जैसे थे, अच्छे थे।

अब ख़्वाब कहां होता है,
जब तन कम सोता है,
अपनी फिक्र नहीं होती,
मन दुविधाओं में खोता है,
अब कौन वैसे खुश होता है,
जैसे तब होते थे,
जब हम बच्चे थे,
जो ख़्वाब थे, सच्चे थे,
जैसे थे, अच्छे थे।

-vj

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कविता

नीर

नीर हूँ मैं,
जैसे सागर में बहती, वैसे ही साँसों में रहती,
निःस्वार्थ इस जग में हर प्राणी की खीर हूँ मैं,
नीर हूँ मैं,

तू याद करेगा उस पल, जब सफर में होगा निर्जल,
भोज्य की तृप्ति जैसी, प्यासे की झील हूं मैं,
नीर हूँ मैं,

कण-कण की प्यास बुझाऊँ, जीने की आस जगाऊँ,
घाटों पर सान से बहती आज बोतल में सील हूँ मैं,
नीर हूँ मैं,

एक रंग और रुप में कई नामों में बदल जाती हूँ,
कहीं गंगा, कहीं गोमती, कहीं शारदा कहलाती हूँ,
और मलिन ना कर मुझको, घर-घर की कोहिनूर हूँ मैं,
नीर हूँ मैं।

-vj

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कविता

अब नींद किसे होती है, और चैन किसे आता है।

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है,

तन्हाई में खोकर मन,
जब गम को गले लगाता है,

वो रो नहीं पाता है,
सपनों में खो नहीं पाता है,

कल की चिंता में,
खुश हो नहीं पाता है,

फिरसे सिमटकर तब,
पग नई दिशा बढ़ाता है,

कभी विफल हो जाता है,
कभी सफलता हाथ लगाता है,

पर राह नई बनाता है,
चलना भी सीख जाता है,

रुक-रुक कर भी वो,
मंजिल को गले लगाता है,

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है।

इक मंजिल हाथ लगी जब,
दूजे की आस से, भर जाता है,

थोड़ा-सा ही मुस्काता है,
अब लक्ष्य बड़े बनाता है,

चींटी की चाल चलकर,
सफलता की मार्ग सजाता है,

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है।

कभी राह नहीं मिलती जब,
मुसाफिर हो जाता है,

छोटे-छोटे कदमों से,
लंबी निशान बनाता है,

आस नये जागता है,
राह नये बनाता है,

दुनियां कहेगी क्या, छोड़कर,
जब मन की सुनने लग जाता है,

कुछ नया ही कर जाता है,
कुछ नया ही बन जाता है,

अब नींद किसे होती है,
और चैन किसे आता है।

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कविता

मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं

मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं,
ना मदिरा न गुड़गुड़ न जाम पीता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

सुबह की झपकी के बाद,
जब आँखे भिगोता हूं,
नई किरणों को ओढ़कर,
हवाओं में सोता हूं,
न कल की फ़िक्र होती है,
न आज की चिंता में रोता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

घुटन की बाधा नहीं होती,
तन कभी प्यादा नहीं होती,
मैं खुद को वज़ीर मानकर,
चाल जब मन चाहा चल देता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

आज मैं खोना नहीं चाहता,
कल भी रोना नहीं चाहता,
यूँ कल-कल की चिंता में भी,
कौन ख़ुश होना नहीं चाहता,
नये आस में तरकर जब,
काज़ आनोखा कर देता हूं,
मैं रोज़ ख़्वाब नए जीता हूं।

-vj

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कविता

मकरसंक्रांति

उमंग की पतंग उड़ाने का वक़्त है,
धनु से मकर राशि में जाने का वक़्त है,
नई फसलों को भोग लगाने का वक़्त है,
जला के तिल वायु महकाने का वक़्त है,
कहीं पोंगल, कहीं बिहु, कहीं माघी है कहते,
यही खिचड़ी का भी उत्सव मनाने का वक़्त है।

आज से दिन और गर्मी का पारा चढ़ेगा,
जनउत्सव है ये जन का नारा चढ़ेगा,
सर्वत्र शुभत्व का लौ होगा प्रकाशित,
संक्रांत होगा मकर जब तारा चढ़ेगा,
यही समरसता, समता याद कराने का वक़्त है,
आज खुशियों का भी उत्सव मनाने का वक़्त है।