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कविता

हौसला

“जीत सकते हो तुम”

उन मुश्किलों, उन हालातों से,
जग की लुभावनी बातों से,
अब्र और बरसातों से,
और आते-जाते ख़यालतों से,
जीत सकते हो तुम।

दुज़ों का होना, कोई डर नहीं,
जब तू बन रहा, निडर नहीं,
वह कौन है जो परेसां कर रहा,
रस्ता न कोई आसान कर रहा,
फिर भी फ़िज़ूली एहतिज़ाजों से,
जीत सकते हो तुम।

हार का कोई ग़म नहीं,
जीत का कोई अहम नहीं,
अदावत भी कुछ कम नहीं,
और जफ़ा हो रही ख़तम नहीं,
फिर भी ऐसी ज़ज़्बातों से,
जीत सकते हो तुम।

उठो औऱ जंग मोल लो,
ग़मों को ग्राम में तोल दो,
ख़ुशी के लफ़ज़ बोल दो,
थक-थक कर चलना छोड़ दो,
सिर्फ ऐसे ही..नगमातों से,
जीत सकते हो तुम।

-vj

अब्र- cloud, ख़यालत- thought, दुज़ों- stranger, परेसां- disturb, फ़िज़ूल- unnecessary, एहतिज़ाज़- objection, अदावत- enemy, जफ़ा- oppression, जज़्बात- feeling, नगमात- thought/mode

छवि श्रेय: इंटरनेट

By साधक

Poetries | Poems | Ghazals | Sher-o-shyaries

41 replies on “हौसला”

बहना सीख रहा हूँ मैं आगे से कुछ उर्दू कविता और ग़ज़ल लिखने वाला हूं तो प्रयास कर रहा हूँ 🙏

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बन्धु शुक्रिया अगर आपके पास वक़त हो तो आप मेरे सारे पोस्ट पढ़िए सच आपको अच्छा लगेगा और मैं चाहता भी हूं कि आप पढ़ें 🙏

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बहोत शुक्रिया पर मैं जब आपके पोस्ट पर कमेंट करता हूँ तो विलुप्त हो जाते हैं 😄

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हार का कोई ग़म नहीं,
जीत का कोई अहम नहीं,
अदावत भी कुछ कम नहीं,
और जफ़ा हो रही ख़तम नहीं,
फिर भी ऐसी ज़ज़्बातों से,
जीत सकते हो तुम।
mind blowing… giving hope in the darkest times

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