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शेर-ओ-शायरी

मेरा ग़म

“Expectations”

हमनें मुक़द्दर से जो भी पाया कम था,
खुद की बनाई शान-ए-शौक़त में मैं ऱम था,
शिकायतें बार-बार किया, वैसा बन जाऊं,
इन्हीं ख़्वाईशों से पल रहा मेरा गम था।

-vj

Probably because you do not see what they did to “deserve” such happiness, and feel that it may be unfair to you that you do not experience such happiness. I think there is no point in thinking about how to “deserve” happiness. People may do a lot of positive things to improve their lives, but sometimes for years you may be experiencing bad time without your personal fault. You must accept that life may be very “unfair”, and we can just try to make the best of our share of things. There are lots of circumstances we cannot control, and we can only choose to cope with them in the best possible way. Believe it or not, most people are not so happy all their lives, happiness ebbs and flows, so there is not really a point in feeling envy. So try to love yourself, believe in yourself and try not to make your life worse if nothing else. Things may get better in time.

छवि श्रेय: इंटरनेट

By साधक

Poetries | Poems | Ghazals | Sher-o-shyaries

13 replies on “मेरा ग़म”

सब सत्य है बहना अगर हम दोनों को समान रूप के देखते हैं तो सही होता है, पर हम प्रसन्नता में पार्टी मानते हैं, मौज़ मस्ती करते हैं और ईश्वर की सराहना करते हैं पर वहीं थोड़ा सा दुख आने पर निंदा करते हैं ईश्वर की। अगर दोनों को समान भाव से समान रूप से लिया जाए तो सब सही रहता है। 🙏

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सच कहा आपने, हम सब को यही बात का सतत अभ्यास करकर अमल करना होता है।
आपके शब्दो को पढ़कर मुझे गीता का एक श्लोक याद आया, जो मैंने पढ़ा था,

अध्याय ६, श्लोक ३२

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योडर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुखं स योगी परमो मत:।।
अर्थात
हे अर्जुन, जो योगी अपनी भांति सुख अथवा दुख में सर्वत्र समत्व के ही दर्शन करता है, सभी को (प्रिय और अप्रिय) समभाव से देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।

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सत्य लिखा बहना आपके विचारों से मैं पूर्णतः सहमत हूँ, अभी मैं श्रीमद्भागवत गीता के द्वितीय अध्याय पर ही हूँ, जल्द ही वहां पहुँच जाऊंगा। धन्यवाद आपका 🙏

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