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कविता

पिता

My father my motivation

पाता हूं जिनको मन-वन में,
तत् शीश वहीं झुकाता हूँ,
जिनकी छाया में पल-ढ़ल कर,
मम् परिभाषित हो पाता हूँ,
मनन-वचन जिनका कर मैं,
जीवन में सफलता लाता हूँ,
ऐसे परम् पूज्य हैं वो,
जिनका मैं पुत्र कहलाता हूँ।

जब होता आशाहीन कभी,
या फिर व्यथित हो जाता हूँ,
सत् पथ होकर भी जब,
पथ भ्रमित हो जाता हूँ,
तब जननी देती अभिलाषा,
और धैर्य जहाँ से लाता हूँ,
भ्रमित पथ का निराकरण,
तब पितृ ज्ञान से पाता हूँ,
ऐसे परम् पूज्य हैं वो,
जिनका गुणगान मैं गाता हूँ।

-vj

Father, you have always believed in me, more than I even believe in myself, thanks for your words of encouragement, you made me who I am today. Your love, care, and support are priceless to me. Father is the greatest gift of Lord all over the world. Show and give proper respect and time to your parents. They are living Lord for us. Thanks everyone, for your time and attention!

छवि श्रेय : इंटरनेट

By साधक

Poetries | Poems | Ghazals | Sher-o-shyaries

17 replies on “पिता”

आपकी कविता पढ़ कर मुझे अपने पिता की यादें आ गईं | मैंने अपने पिता को बहुत काम उम्र में खो दिया था, वो पचपन और मैँ करीब बाईस का| 
अभी 2017 में उनका  100 जन्मदिन गया था , तब एक कविता अनायास ही लिखी गई थी : मुझे अत्यधिक  पसंद है , शायद पिता पर है इस लिये |  जरूर पढ़ें, मिझे अच्छा लगेगा :
https://rkkblog1951.wordpress.com/2019/06/17/बाबूजी/ 

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