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कविता

मेरी बहना मुझे पता है

The best think about having a sister is that you have a permanent gift from Lord.

मैं कौन हूँ, क्या हूँ सब जानती है तू,
मेरी बहना मुझे पता है कितना मानती है तू,

हाथों की लकीरें साज़िशें कर रहीं, ख़बर किसे!
पर हर साज़िशों का ठिकाना बख़ूबी पहचानती है तू,
क़हर-ए-वक़त का जब भी होता हूँ मारा,
हौसला-ए-बहार लिए रूह में जान डालती है तू,
मेरी बहना मुझे पता है कितना मानती है तू।

वो बापू की ख़ामोशी को अल्फ़ाज़ दे जाना,
माँ के गुस्से को मुस्कुराहट के आगाज़ दे जाना,
मुझ जैसे आलसी को थोड़े काम-काज़ दे जाना,
हाँ ऐसे ही घर की खुशियों के तराने बांधती है तू,
मेरी बहना मुझे पता है कितना मानती है तू।

किसी रुख़-ए-हवा से डरना नहीं कभी,
मंज़िल पे पहुँचने से पहले ठहरना नहीं कभी,
हर मुश्किलों से टकराने की ताक़त है तुझमें,
वो सारी दुवाएँ तिरी, जितनी इबादत है मुझमें,
बस ऐसे ही रहना जैसे रहना जानती है तू,
मेरी बहना मुझे पता है कितना मानती है तू।

–vj

It’s an open proposal to everyone if anyone like to be my sister, I will accept.

छवि श्रेय: इंटरनेट

By साधक

Poetries | Poems | Ghazals | Sher-o-shyaries

12 replies on “मेरी बहना मुझे पता है”

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