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मैं अक्सर ढ़क्कन निकाल दिया करता हूं

शब्दों से काफ़ी जाना पहचाना लगेगा और जैसा आप सोच रहे होंगे शायद वैसा ही हो।
पर यह कटु सत्य है,
अक़्सर नहीं हमेशा ही मैं ढ़क्कन निकाल दिया करता हूं।


चाहे वो अपनी हो या पराई, मैंने आज तक कभी ढ़क्कन नहीं लगाई।

आदत कब पड़ी पता नहीं पर आदत अब तक है और रहेगी अवश्य जानता हूं।
बहोत सोचा ऐसा क्यों होता है मेरे साथ, मैं क्यों हूँ ऐसा, सोचा भी पता भी किया पर कभी किसी को कह न सका। उसका ज़िक्र आपसे कर रहा हूं बस। मैंने खुद से बाहोत पूछा और भूल भी गया। यही सिलसिला चलता रहा और अब भी जारी है। फिर भी न जाने क्यों मैं ढक्कन नहीं लगाता।


स्याही ख़त्म थी, पेन भी टूट ही गयी थी, दूसरी लेने की सोच रखी थी,…….पैसे नहीं थे 🖊️ पर पास ढ़क्कन ज़रूर थी।

आज भी इतना वक्त निकल जाने के बाद मुझे यही एहसास होता है मैं ढ़क्कन क्यों नहीं लगा पाता और मैं अक़्सर वो ढ़क्कन खो भी देता हूं। मैं शायद उसकी परवाह ही नही करता इसलिये ऐसा होता है। शायद मैं उसकी पूरी कदर करता तो उसे कभी नही खोता। सच यही है मैं आज तक ऐसा कोई ढ़क्कन नही पाया, न बनाया जो मेरे साथ रहे, और जिसे हमेशा जिसे मैं अपना कह सकूं। मैं किसे कहुँ अपना ढ़क्कन जब मैं उसे खुद खो देता हूं, कदर नहीं देता हूं।  पर अब मैं अपनी ढ़क्कन वापस चाहता हूं। क्या कोई मेरी ढ़क्कन देखा है? क्या कोई मेरी ढ़क्कन वापस करेगा? क्या कोई मेरा ढक्कन बनेगा ?


मैं अधूरा हूं अब उस ढ़क्कन के बिना मैं भी एक साथी चाहता हूं, स्याही सूखने से पहले सफर में एक राही चाहता हूं।

By साधक

Poetries | Poems | Ghazals | Sher-o-shyaries

8 replies on “मैं अक्सर ढ़क्कन निकाल दिया करता हूं”

mera matlab tha, it brought smile… mae bhi nikal diya karta tha..itne khoye phir samjh aa gyi..ab dhakan hamesa pen se hi jodkar rakhta hun…itni aadat ho gyi he ki bina dhakkan ko pen ke pichhe chipakaye likha nhi jata… baki aapka lekh sundar he

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उम्र में क्या रखा है कल वो भी आनी है, जीवन बस सुखद होना चाइये, प्रसन्न रहिये स्वस्थ रहिये🙏

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umar me bahut rakha he..jab chhota tha to lagta tha ki umar me kya rakha he..par ab tv dekhta hun to actor dikhte he bache bache..koi kuchh karta he naujvaan shararat ya baat badi deshbhakti to lagta hae bachpana…. mere bhai kehta he ki jab tak vo baap nhi bana tha tab tak samjha nhi kabhi ki baap kya hota he…. chahiye… vaqt ho aaya ..kal swadesh…. peen-pi-peen..ye jo desh he mera…suna hae bahut kuchh chal rakha hae vahan..kuchh kagaz kagaz ka lafda bhi he.. follow karne ke liye dhanyavaad… aapse bahut kuchh sikhne ko milega… mae bhi saadhak hindi ka… nhi to mujhe lagta hae mae hindi bhi pahadi me likhata hun… ‘par’ ki jagah bhi ‘me’ hi laga deta hun… dhanyvaad once again.

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